गति के समीकरण (Equations of Motion) – 20 न्यूमेरिकल ▫️ उपयोगी सूत्र 1. v = u + at 2. s = ut + 1/2at2 3. v^2 = u^2 + 2as ⸻ प्रश्न 1.एक वस्तु विराम से चलकर 4 m/s² के त्वरण से 5 s तक चलती है। अंतिम वेग ज्ञात कीजिए। हल: u = 0, a = 4 m/s², t = 5 s v = u + at v = 0 + (4 × 5) = 20 m/s ⸻ प्रश्न 2. एक साइकिल 2 m/s के वेग से चल रही है। 3 m/s² के त्वरण से 4 s तक चलती है। अंतिम वेग ज्ञात कीजिए। हल: u = 2, a = 3, t = 4 v = u + at = 2 + 12 = 14 m/s ⸻ प्रश्न 3. एक धावक 10 m/s के वेग से चल रहा है। 2 m/s² के ऋणात्मक त्वरण से 5 s में रुक जाता है। विस्थापन ज्ञात कीजिए। हल: u = 10, a = –2, t = 5 s = ut + ½at² s = (10×5) + ½(–2)(25) s = 50 – 25 = 25 m ⸻ प्रश्न 4. एक ट्रेन 20 m/s के वेग से चल रही है और 1 m/s² से धीमी होती है। रुकने तक चली दूरी ज्ञात कीजिए। हल: u = 20, v = 0, a = –1 v² = u² + 2as 0 = 400 – 2s s = 200 m ⸻ प्रश्न 5. एक स्कूटर विराम से चलकर 2.5 m/s² के त्वरण से 8 s में चलता है। दूरी ज्ञात कीजिए। हल: u = 0, a = 2.5, t = 8 s = ½at² = ½ × 2.5 × 64 = 80 m ⸻ प्रश्न 6. एक कार 10 m/s से...
रस - शब्द और अर्थ काव्य का शरीर है तो रस काव्य की आत्मा कहलाता है । आत्मा से तात्पर्य काव्य के मूल या उसके प्राण से है, जिसके बिना काव्य मात्र पद्य बनकर रह जाता है । रस उत्तम काव्य का अनिवार्य गुण है ।
रस की परिभाषा - कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि पढ़ने, सुनने या देखने से लोगों को जो एक प्रकार के विलक्षण आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं । काव्यास्वादन के अनिर्वचनीय आनन्द को रस कहा गया है ।
किसी काव्य के पठन, श्रवण या अभिनय दर्शन,
पाठक, श्रोता, अभिनय दर्शक का जब हर लेता मन । और अलौकिक आनन्द से जब मन तन्मय हो जाता,
मन का यह रूप काव्य में रस कहलाता ।
रस को काव्य का आनन्द मान सकते हैं । मानव हृदय भावों का भंडार है । समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार हृदय में विभिन्न भाव जाग्रत होते रहते हैं । उन भावों के अनुरूप ही रस की अनुभूति होती है । इस संबंध में आचार्य भरतमुनि के अनुसार -
"विभावनुभाव संचारी संयोगद्रसनिष्पति:"
अर्थात विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पति होती है ।
रस के अंग- रस के चार अंग हैं-
(1) स्थायी भाव, (2) विभाव, (3) अनुभाव, (4) संचारी भाव ।
(1) स्थायी भाव- जो भाव मनुष्य के हृदय में हमेशा विद्यमान रहते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहा जाता है । ये छिपाएं नहीं जाते और इनमें परिवर्तन भी नहीं होता ।
रस स्थायी भाव
(1) श्रृंगार रति ( प्रेम )
(2) हास्य हास
(3) करुण शोक
(4) रौद्र। क्रोध
(5) वीर उत्साह
(6) भयानक भय
(7) वीभत्स जुगुप्सा ( घृणा )
(8) अद्भुत आश्चर्य ( विस्मय )
(9) शांत निर्वेद
(10) वात्सल्य वात्सल ( सन्तान प्रेम )
(2) विभाव- जो व्यक्ति अथवा वस्तु अन्य व्यक्ति के हृदयों में भावो का उद्रेक करती है, उन भावों के कारणों को विभाव कहते हैं । दूसरे शब्दों में, स्थायी भाव के कारण को विभाव कहते हैं ।
अथवा
वे परिस्थितियां जिनके कारण स्थायी भाव जाग्रत होते हैं, उन्हें विभाव कहते हैं ।
विभाव के दो भेद हैं - (i) आलम्बन विभाव एवं (ii) उद्दीपन विभाव ।
(i) आलम्बन विभाव - जिसके सहारे रस निष्पति हो आलम्बन विभाव कहते हैं । आलम्बन विभाव ऐसे कारणों को कहते हैं, जिन पर भाव अवलंबित रहता है ।
इसके दो भेद हैं - (1) आश्रय, (2) विषय ।
आश्रय- जिस व्यक्ति में स्थायी भाव स्थिर रहता है, उसे आश्रय कहते हैं । जैसे - श्रृंगार रस में नायक अथवा नायिका दोनों एक दूसरे के आश्रय होते हैं ।
विषय- जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति आश्रय के मन मे रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न हैं, उसे विषय कहते हैं ।
उदाहरण- दुष्यंत के मन में शकुन्तला को देखकर प्रेम भाव, उत्पन्न हो रहा है तो दुष्यंत शकुन्तला विषयक प्रेम भाव का आश्रय कहलाएगा और शकुन्तला विषय कहलायेगी ।
आश्रय और विषय इन दोनों को आलम्बन विभाव कहते हैं ।
(ii) उद्दीपन विभाव- जो आलम्बन द्वारा उत्पन्न भावों को उदीप्त करते हैं, अर्थात तीव्र करते हैं । उन्हें उद्दीपन विभाव कहते हैं । इसके भी दो भेद हैं - (1) बाहरी वातावरण एवं (2) विषय की बाहरी चेष्टाऐं ।
उदाहरण के लिए- किसी निर्जन वन में घने अंधकार में कोई व्यक्ति घिर जाता है उसे भालू घेर लेता है या सिंह की गर्जना उसे सुनाई पड़ती है तो वह काँपने लगता है । इस उदाहरण में भय से कापता हुआ व्यक्ति आश्रय है, भालू विषय है तथा निर्जन वन, अंधकार, सिंह की गर्जन आदि उद्दीपन विभाव हैं, जिससे भय और बढ़ जाता है । भालू द्वारा मुंह फाड़ा जाना, पंजा मारना आदि विषय की बाहरी चेष्टाएँ हैं ।
(3) अनुभाव- आश्रय की बाहरी चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं । इसी को अंग्रेजी में एक्टिंग भी कहते हैं । यथा- भालू से भयभीत व्यक्ति का कांपना, चीखना, हाथ-पांव मारना, भागने की चेष्टा करना आदि अनुभाव के उदाहरण हैं ।
(4) संचारी भाव- आश्रय के चित्त में जल्दी-जल्दी उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं । यथा- भयभीत व्यक्ति के मन में उत्पन्न चिंता, शंका, त्रास, मोह, जड़ता, उन्माद आदि भाव संचारी भाव कहलाते हैं ।
संचारी भाव की संख्या वैसे तो असख्य मानी जाती है, किन्तु उनकी संख्या 33 मानी गयी है, जो निम्नलिखित हैं- निर्वेद, ग्लानि, मद, स्मृति, शंका, आलस्य, चिंता, दीनता,मोह, चपलता, हर्ष, धृति, त्रास, उग्रता, उन्माद, असूया, श्रम, क्रीड़ा, आवेग, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अवमर्ष, अवहित्था, मति, व्याधि, मरण, वितर्क, जड़ता ।
व्यभिचारी शब्द- वि + अभि + चारी से बना है । वि = विशेष रूप से । अभि = 'और' अथवा 'प्रति' । चारी = चलने वाला । अर्थात व्यभिचारी भाव वे हैं, जो विशेष रीति से मुख्य रस हेतु स्थायी भावों की ओर संचरण करें । वे स्थायी भावों में हमेशा आविर्भूत और और तिरोभूत होते रहते हैं । ये सभी रसों में संचार करते हैं । श्रृंगार रस में तो प्रायः सभी संचारी भाव आ जाते हैं । संचरण गुण के कारण ही इन्हें संचारी भाव कहा जाता है ।
रस विवेचन- रसों की संख्या 10 मानी गई हैं- (1) श्रृंगार, (2) हास्य, (3) करुण, (4) रौद्र, (5) वीर, (6) भयानक, (7) वीभत्स, (8) अद्भुत, (9) शांत और (10) वात्सल्य रस ।
1.श्रृंगार रस-
परिभाषा- सहृदय के हृदय में 'रति' नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह श्रृंगार रस का रूप ग्रहण कर लेता है ।
श्रृंगार रस को रसराज कहा जाता है । इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है कि जिन परिस्थितियों में विभाव जाग्रत होते हैं, उनके अभाव में रति नामक स्थायी भाव जाग्रत हो जाते हैं । यही कारण है कि श्रृंगार रस के दो पक्ष हो जाते हैं-
श्रृंगार रस के दो भेद- (1) संयोग श्रृंगार तथा (2) वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार ।
(1) संयोग श्रृंगार- जहां पर नायक-नायिका के संयोग या मिलन का वर्णन हो, वहां संयोग श्रृंगार होता है ।
(2) वियोग श्रृंगार- जहां पर नायक-नायिका के विरह का वर्णन हो, वहां वियोग श्रृंगार होगा है ।
संयोग श्रृंगार के उदाहरण-
(1) राम के रूप निहारति जानकी, कंगन के नग की परछाई ।
यातै सबै सुधि भूलि गई, कर टेकि रही पल टारति नाही ।। - तुलसीदास
इस पद्य में रति स्थायी भाव है । राम-सीता विभाव, सीता के द्वारा राम के रूप का एकटक देखा जाना अनुभाव है, पलकों का न झपकना, स्मृतिहीनता आदि संचारी भाव हैं ।
इस तरह सहृदय के हृदय में स्थित 'रति' नामक स्थायी भाव इन सब विभाव आदि के संयोग से रस के रूप में व्यंजित होता है ।
(2) कहत नटत, रीझत, खिझत, मिलत, लजियात ।
भरे भौन में करत है, नैनन ही सों बात ।। - बिहारी
यहां भी रति स्थायी भाव है । आश्रय नायक । आलम्बन नायिका । नेत्रों से बात करना अनुभाव है । नायिका का सौंदर्य उसका नटना, खीझना, उद्दीपन तथा लज्जा संचारी भाव है ।
वियोग श्रृंगार के उदाहरण-
(1) मधुवन तुम कत रहत हरे
विरह-वियोग श्याम सुंदर के ठाढ़े क्यों न जरे ।
ससा स्यार और बनके पखेरू धिक-धिक सब निकरे ।।
इस उदाहरण में गोपी आश्रय है और कृष्ण विषय है- दोनों आलम्बन विभाव है । मधुबन तथा पक्षी वृन्दो का कुंजन उद्दीपन विभाव हैं । गोपियों के विषादमय कथन अनुभाव है । खीझ, धिक्कार आदि संचारी भाव हैं । रति स्थायी भाव है । यहां कृष्ण-गोपी के विरह का वर्णन है । अतः यह वियोग श्रृंगार का उदाहरण है ।
(2) शिशिर, न फिरि गिरि-वन में ।
जितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इन निज नन्दन में ।
× × ×
हँसी गई, रो भी न सकूँ मैं- अपने इस जीवन में ?
-साकेत - उर्मिला विरह -वर्णन
(3) घन घमण्ड नभ गरजत घोरा । प्रियाहीन डरपत मन मोरा ।।
दामिनी दमक रही घन माहीं । खल की प्रीत यथा थिर नाहीं ।।
स्थायी भाव- रति
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय-राम, (ख) विषय-सीता ।
(2) उद्दीपन- बादल गरजना, बिजली चमकना, काले-भूरे बादलों का आकाश में छाना ।
अनुभाव- स्तम्भ, कम्प, स्वर-भंग, विवरण, आंसू ।
संचारी भाव- मोह, चिंता, शंका, ग्लानि, विषाद ।।
2. हास्य रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित हास नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (हास) हास्य रस के रूप में बदल जाता है । हास्य रस में हंसी या व्यंग्य संबंधी वर्णन होता है-
उदाहरण- (1) इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो ।
आराम जिंदगी की कुन्जी, इससे न तपेदिक होती है,
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है,
आराम शब्द में राम छिपा, जो भव बंधन को खोता है,
आराम शब्द का ज्ञाता तो, विरला ही योगी होता है ।
इसलिए तुम्हें समझता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो ।
- गोपाल प्रसाद व्यास : अजी सुनो
यहाँ 'हास' स्थायी भाव है, आलसी व्यक्ति विभाव, हँसना अनुभाव, हर्ष, निर्लज्जता आदि संचारी भाव हैं ।
उदाहरण- (2) विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महाबिनु नारि दुखारे ।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुन ये मुनि वृन्द सुखारे ।।
व्है है शिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे ।
कीन्हीं भली रधुनायक जू करुना कर कानन को पगु धारे ।।
स्थायी भाव- हास
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- श्रोता, पाठक, दर्शक । (ख) विषय- विन्घ्यगिरि के ऋषि ।
(2) उद्दीपन- ऋषियों की प्राथना, राम की प्रशंसा, गौतम नारी की कथा ।
अनुभाव- मुस्कान, ऋषियों का हाथ जोड़ना, रोमांच ।
संचारी भाव- हर्ष, अलसता, चपलता, उत्सुकता ।
उदाहरण- (3) कहा बन्दरिया ने बन्दर से, चलो नहायें गंगा ।
बच्चों को छोड़ेंगे घर में होने दो हुड़दंगा ।।
3. वीर रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित उत्साह नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (उत्साह) वीर रस के रूप में बदल जाता है ।
उदाहरण- (1) हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र की आकर अड़े, है खेल क्षत्रिय बालकों के व्यूह-भेदन कर लड़ें ।
मैं सत्य कहता हूँ सखे ! सुकुमार मत जानों मुझे,
यमराज से भी युद्ध को प्रस्तुत सदा मानो मुझे ।
- मैथिलीशरण गुप्त : जयद्रथ वध
स्थायी भाव- उत्साह
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- अभिमन्यु ।
(ख) विषय- शत्रु पक्ष ।
(2) उद्दीपन- व्यूह रचना, दुश्मन की ललकार, युद्ध के नगाड़े ।
अनुभाव-अभिमन्यु के वचन, रोमांच, युद्ध की तैयारी, युद्ध के लिए प्रस्थान, सारथी को समझाना, अपनी शक्ति का परिचय देना ।
संचारी भाव- उत्सुकता, रोमांच, आनन्द, हर्ष, गर्व, उग्रता ।
उदाहरण- (2) सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी ।
बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी।
- सुभद्रा कुमारी चौहान
4. करुण रस
परिभाषा- रसिकों के हृदय में स्थित शोक नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुुुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (शोक) करुण रस में बदल जाता है ।
उदाहरण- (1) सब बन्धुन को सोच तजि, तजि, गुरुकुल को नेह ।
हा सुशील सुत ! किमि कियो अनन्त लोक में गेह ।
- हिन्दी रस : गंगाधर
यहाँ शोक स्थायी भाव है । पिता आश्रय है । पुत्र विषय ( आलम्बन ) है । दुःख के उद्गार अनुभाव हैं । दीनता, मोह, विषाद, जड़ता आदि संचारी भाव हैं ।
इसी प्रकार-
(2) अभी तो मुकुट बंधा था माथ, हुए कल ही हल्दी के हाथ ।
खुले भी न थे लाज के बोल, खिले भी चुम्बन शून्य कपोल ।
हाय रुक गया यहीं संसार, बना सिन्दूर अंगार ।
- सुमित्रानंदन पंत : पल्लव
यह पद्य भी करुण रस का उदाहरण है ।
(3) प्रिय सुत वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है,
इस दुःख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है ।
लख मुख जिसका मैं, आज लौ जी सकी हूँ,
वह हृदय दुलारा, नेत्र तारा कहाँ है ?
स्थायी भाव- शोक ।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- यशोदा ।
(ख) विषय- कृष्ण ।
(2) उद्दीपन- कृष्ण का सुंदर मुख, उनकी लीलाओं का स्मरण, खेल की स्मृति ।
अनुभाव- कम्प, स्वरभंग, वैवनर्य, आँसू ।
संचारी भाव- स्मृति, विषाद, चिन्ता, उन्माद, मोह, ग्लानि ।
5. रौद्र रस
परिभाषा- रसिकों के हृदय में स्थित क्रोध नामक स्थायी भाव का संयोग जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से हो जाता है, तब वह रौद्र ( क्रोध ) रस के रूप में बदल जाता है ।
उदाहरण- (1) बालकु बोलि बधऊँ नहिं तोही, केवल मुनि जड़ जानहि मोही ।
बाल ब्रम्हचारी अति कोही, विश्व विदित छत्रिय कुल द्रोही ।
रस की परिभाषा - कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि पढ़ने, सुनने या देखने से लोगों को जो एक प्रकार के विलक्षण आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं । काव्यास्वादन के अनिर्वचनीय आनन्द को रस कहा गया है ।
किसी काव्य के पठन, श्रवण या अभिनय दर्शन,
पाठक, श्रोता, अभिनय दर्शक का जब हर लेता मन । और अलौकिक आनन्द से जब मन तन्मय हो जाता,
मन का यह रूप काव्य में रस कहलाता ।
रस को काव्य का आनन्द मान सकते हैं । मानव हृदय भावों का भंडार है । समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार हृदय में विभिन्न भाव जाग्रत होते रहते हैं । उन भावों के अनुरूप ही रस की अनुभूति होती है । इस संबंध में आचार्य भरतमुनि के अनुसार -
"विभावनुभाव संचारी संयोगद्रसनिष्पति:"
अर्थात विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पति होती है ।
रस के अंग- रस के चार अंग हैं-
(1) स्थायी भाव, (2) विभाव, (3) अनुभाव, (4) संचारी भाव ।
(1) स्थायी भाव- जो भाव मनुष्य के हृदय में हमेशा विद्यमान रहते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहा जाता है । ये छिपाएं नहीं जाते और इनमें परिवर्तन भी नहीं होता ।
रस स्थायी भाव
(1) श्रृंगार रति ( प्रेम )
(2) हास्य हास
(3) करुण शोक
(4) रौद्र। क्रोध
(5) वीर उत्साह
(6) भयानक भय
(7) वीभत्स जुगुप्सा ( घृणा )
(8) अद्भुत आश्चर्य ( विस्मय )
(9) शांत निर्वेद
(10) वात्सल्य वात्सल ( सन्तान प्रेम )
(2) विभाव- जो व्यक्ति अथवा वस्तु अन्य व्यक्ति के हृदयों में भावो का उद्रेक करती है, उन भावों के कारणों को विभाव कहते हैं । दूसरे शब्दों में, स्थायी भाव के कारण को विभाव कहते हैं ।
अथवा
वे परिस्थितियां जिनके कारण स्थायी भाव जाग्रत होते हैं, उन्हें विभाव कहते हैं ।
विभाव के दो भेद हैं - (i) आलम्बन विभाव एवं (ii) उद्दीपन विभाव ।
(i) आलम्बन विभाव - जिसके सहारे रस निष्पति हो आलम्बन विभाव कहते हैं । आलम्बन विभाव ऐसे कारणों को कहते हैं, जिन पर भाव अवलंबित रहता है ।
इसके दो भेद हैं - (1) आश्रय, (2) विषय ।
आश्रय- जिस व्यक्ति में स्थायी भाव स्थिर रहता है, उसे आश्रय कहते हैं । जैसे - श्रृंगार रस में नायक अथवा नायिका दोनों एक दूसरे के आश्रय होते हैं ।
विषय- जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति आश्रय के मन मे रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न हैं, उसे विषय कहते हैं ।
उदाहरण- दुष्यंत के मन में शकुन्तला को देखकर प्रेम भाव, उत्पन्न हो रहा है तो दुष्यंत शकुन्तला विषयक प्रेम भाव का आश्रय कहलाएगा और शकुन्तला विषय कहलायेगी ।
आश्रय और विषय इन दोनों को आलम्बन विभाव कहते हैं ।
(ii) उद्दीपन विभाव- जो आलम्बन द्वारा उत्पन्न भावों को उदीप्त करते हैं, अर्थात तीव्र करते हैं । उन्हें उद्दीपन विभाव कहते हैं । इसके भी दो भेद हैं - (1) बाहरी वातावरण एवं (2) विषय की बाहरी चेष्टाऐं ।
उदाहरण के लिए- किसी निर्जन वन में घने अंधकार में कोई व्यक्ति घिर जाता है उसे भालू घेर लेता है या सिंह की गर्जना उसे सुनाई पड़ती है तो वह काँपने लगता है । इस उदाहरण में भय से कापता हुआ व्यक्ति आश्रय है, भालू विषय है तथा निर्जन वन, अंधकार, सिंह की गर्जन आदि उद्दीपन विभाव हैं, जिससे भय और बढ़ जाता है । भालू द्वारा मुंह फाड़ा जाना, पंजा मारना आदि विषय की बाहरी चेष्टाएँ हैं ।
(3) अनुभाव- आश्रय की बाहरी चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं । इसी को अंग्रेजी में एक्टिंग भी कहते हैं । यथा- भालू से भयभीत व्यक्ति का कांपना, चीखना, हाथ-पांव मारना, भागने की चेष्टा करना आदि अनुभाव के उदाहरण हैं ।
(4) संचारी भाव- आश्रय के चित्त में जल्दी-जल्दी उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं । यथा- भयभीत व्यक्ति के मन में उत्पन्न चिंता, शंका, त्रास, मोह, जड़ता, उन्माद आदि भाव संचारी भाव कहलाते हैं ।
संचारी भाव की संख्या वैसे तो असख्य मानी जाती है, किन्तु उनकी संख्या 33 मानी गयी है, जो निम्नलिखित हैं- निर्वेद, ग्लानि, मद, स्मृति, शंका, आलस्य, चिंता, दीनता,मोह, चपलता, हर्ष, धृति, त्रास, उग्रता, उन्माद, असूया, श्रम, क्रीड़ा, आवेग, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अवमर्ष, अवहित्था, मति, व्याधि, मरण, वितर्क, जड़ता ।
व्यभिचारी शब्द- वि + अभि + चारी से बना है । वि = विशेष रूप से । अभि = 'और' अथवा 'प्रति' । चारी = चलने वाला । अर्थात व्यभिचारी भाव वे हैं, जो विशेष रीति से मुख्य रस हेतु स्थायी भावों की ओर संचरण करें । वे स्थायी भावों में हमेशा आविर्भूत और और तिरोभूत होते रहते हैं । ये सभी रसों में संचार करते हैं । श्रृंगार रस में तो प्रायः सभी संचारी भाव आ जाते हैं । संचरण गुण के कारण ही इन्हें संचारी भाव कहा जाता है ।
रस विवेचन- रसों की संख्या 10 मानी गई हैं- (1) श्रृंगार, (2) हास्य, (3) करुण, (4) रौद्र, (5) वीर, (6) भयानक, (7) वीभत्स, (8) अद्भुत, (9) शांत और (10) वात्सल्य रस ।
1.श्रृंगार रस-
परिभाषा- सहृदय के हृदय में 'रति' नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह श्रृंगार रस का रूप ग्रहण कर लेता है ।
श्रृंगार रस को रसराज कहा जाता है । इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है कि जिन परिस्थितियों में विभाव जाग्रत होते हैं, उनके अभाव में रति नामक स्थायी भाव जाग्रत हो जाते हैं । यही कारण है कि श्रृंगार रस के दो पक्ष हो जाते हैं-
श्रृंगार रस के दो भेद- (1) संयोग श्रृंगार तथा (2) वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार ।
(1) संयोग श्रृंगार- जहां पर नायक-नायिका के संयोग या मिलन का वर्णन हो, वहां संयोग श्रृंगार होता है ।
(2) वियोग श्रृंगार- जहां पर नायक-नायिका के विरह का वर्णन हो, वहां वियोग श्रृंगार होगा है ।
संयोग श्रृंगार के उदाहरण-
(1) राम के रूप निहारति जानकी, कंगन के नग की परछाई ।
यातै सबै सुधि भूलि गई, कर टेकि रही पल टारति नाही ।। - तुलसीदास
इस पद्य में रति स्थायी भाव है । राम-सीता विभाव, सीता के द्वारा राम के रूप का एकटक देखा जाना अनुभाव है, पलकों का न झपकना, स्मृतिहीनता आदि संचारी भाव हैं ।
इस तरह सहृदय के हृदय में स्थित 'रति' नामक स्थायी भाव इन सब विभाव आदि के संयोग से रस के रूप में व्यंजित होता है ।
(2) कहत नटत, रीझत, खिझत, मिलत, लजियात ।
भरे भौन में करत है, नैनन ही सों बात ।। - बिहारी
यहां भी रति स्थायी भाव है । आश्रय नायक । आलम्बन नायिका । नेत्रों से बात करना अनुभाव है । नायिका का सौंदर्य उसका नटना, खीझना, उद्दीपन तथा लज्जा संचारी भाव है ।
वियोग श्रृंगार के उदाहरण-
(1) मधुवन तुम कत रहत हरे
विरह-वियोग श्याम सुंदर के ठाढ़े क्यों न जरे ।
ससा स्यार और बनके पखेरू धिक-धिक सब निकरे ।।
इस उदाहरण में गोपी आश्रय है और कृष्ण विषय है- दोनों आलम्बन विभाव है । मधुबन तथा पक्षी वृन्दो का कुंजन उद्दीपन विभाव हैं । गोपियों के विषादमय कथन अनुभाव है । खीझ, धिक्कार आदि संचारी भाव हैं । रति स्थायी भाव है । यहां कृष्ण-गोपी के विरह का वर्णन है । अतः यह वियोग श्रृंगार का उदाहरण है ।
(2) शिशिर, न फिरि गिरि-वन में ।
जितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इन निज नन्दन में ।
× × ×
हँसी गई, रो भी न सकूँ मैं- अपने इस जीवन में ?
-साकेत - उर्मिला विरह -वर्णन
(3) घन घमण्ड नभ गरजत घोरा । प्रियाहीन डरपत मन मोरा ।।
दामिनी दमक रही घन माहीं । खल की प्रीत यथा थिर नाहीं ।।
स्थायी भाव- रति
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय-राम, (ख) विषय-सीता ।
(2) उद्दीपन- बादल गरजना, बिजली चमकना, काले-भूरे बादलों का आकाश में छाना ।
अनुभाव- स्तम्भ, कम्प, स्वर-भंग, विवरण, आंसू ।
संचारी भाव- मोह, चिंता, शंका, ग्लानि, विषाद ।।
2. हास्य रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित हास नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (हास) हास्य रस के रूप में बदल जाता है । हास्य रस में हंसी या व्यंग्य संबंधी वर्णन होता है-
उदाहरण- (1) इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो ।
आराम जिंदगी की कुन्जी, इससे न तपेदिक होती है,
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है,
आराम शब्द में राम छिपा, जो भव बंधन को खोता है,
आराम शब्द का ज्ञाता तो, विरला ही योगी होता है ।
इसलिए तुम्हें समझता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो ।
- गोपाल प्रसाद व्यास : अजी सुनो
यहाँ 'हास' स्थायी भाव है, आलसी व्यक्ति विभाव, हँसना अनुभाव, हर्ष, निर्लज्जता आदि संचारी भाव हैं ।
उदाहरण- (2) विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महाबिनु नारि दुखारे ।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुन ये मुनि वृन्द सुखारे ।।
व्है है शिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे ।
कीन्हीं भली रधुनायक जू करुना कर कानन को पगु धारे ।।
स्थायी भाव- हास
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- श्रोता, पाठक, दर्शक । (ख) विषय- विन्घ्यगिरि के ऋषि ।
(2) उद्दीपन- ऋषियों की प्राथना, राम की प्रशंसा, गौतम नारी की कथा ।
अनुभाव- मुस्कान, ऋषियों का हाथ जोड़ना, रोमांच ।
संचारी भाव- हर्ष, अलसता, चपलता, उत्सुकता ।
उदाहरण- (3) कहा बन्दरिया ने बन्दर से, चलो नहायें गंगा ।
बच्चों को छोड़ेंगे घर में होने दो हुड़दंगा ।।
3. वीर रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित उत्साह नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (उत्साह) वीर रस के रूप में बदल जाता है ।
उदाहरण- (1) हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र की आकर अड़े, है खेल क्षत्रिय बालकों के व्यूह-भेदन कर लड़ें ।
मैं सत्य कहता हूँ सखे ! सुकुमार मत जानों मुझे,
यमराज से भी युद्ध को प्रस्तुत सदा मानो मुझे ।
- मैथिलीशरण गुप्त : जयद्रथ वध
स्थायी भाव- उत्साह
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- अभिमन्यु ।
(ख) विषय- शत्रु पक्ष ।
(2) उद्दीपन- व्यूह रचना, दुश्मन की ललकार, युद्ध के नगाड़े ।
अनुभाव-अभिमन्यु के वचन, रोमांच, युद्ध की तैयारी, युद्ध के लिए प्रस्थान, सारथी को समझाना, अपनी शक्ति का परिचय देना ।
संचारी भाव- उत्सुकता, रोमांच, आनन्द, हर्ष, गर्व, उग्रता ।
उदाहरण- (2) सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी ।
बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी।
- सुभद्रा कुमारी चौहान
4. करुण रस
परिभाषा- रसिकों के हृदय में स्थित शोक नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुुुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (शोक) करुण रस में बदल जाता है ।
उदाहरण- (1) सब बन्धुन को सोच तजि, तजि, गुरुकुल को नेह ।
हा सुशील सुत ! किमि कियो अनन्त लोक में गेह ।
- हिन्दी रस : गंगाधर
यहाँ शोक स्थायी भाव है । पिता आश्रय है । पुत्र विषय ( आलम्बन ) है । दुःख के उद्गार अनुभाव हैं । दीनता, मोह, विषाद, जड़ता आदि संचारी भाव हैं ।
इसी प्रकार-
(2) अभी तो मुकुट बंधा था माथ, हुए कल ही हल्दी के हाथ ।
खुले भी न थे लाज के बोल, खिले भी चुम्बन शून्य कपोल ।
हाय रुक गया यहीं संसार, बना सिन्दूर अंगार ।
- सुमित्रानंदन पंत : पल्लव
यह पद्य भी करुण रस का उदाहरण है ।
(3) प्रिय सुत वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है,
इस दुःख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है ।
लख मुख जिसका मैं, आज लौ जी सकी हूँ,
वह हृदय दुलारा, नेत्र तारा कहाँ है ?
स्थायी भाव- शोक ।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- यशोदा ।
(ख) विषय- कृष्ण ।
(2) उद्दीपन- कृष्ण का सुंदर मुख, उनकी लीलाओं का स्मरण, खेल की स्मृति ।
अनुभाव- कम्प, स्वरभंग, वैवनर्य, आँसू ।
संचारी भाव- स्मृति, विषाद, चिन्ता, उन्माद, मोह, ग्लानि ।
5. रौद्र रस
परिभाषा- रसिकों के हृदय में स्थित क्रोध नामक स्थायी भाव का संयोग जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से हो जाता है, तब वह रौद्र ( क्रोध ) रस के रूप में बदल जाता है ।
उदाहरण- (1) बालकु बोलि बधऊँ नहिं तोही, केवल मुनि जड़ जानहि मोही ।
बाल ब्रम्हचारी अति कोही, विश्व विदित छत्रिय कुल द्रोही ।
यहाँ पर क्रोध स्थायी भाव है, परशुराम जी आश्रय, लक्ष्मण जी विषय, लक्ष्मण के कटु वचन उद्दीपन विभाव हैं, परशुराम का फरसा चमकाना, क्रोध से आंखें लाल होना अनुभाव तथा गर्व संचारी भाव है । इन सबके संयोग से रौद्र रस का सुंदर परिपाक हुआ है ।
उदाहरण-(2) श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपना भूलकर करतल-युगल मलने लगे।
'संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।'
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े।।
उस काल मारे क्रोध के तन कापने उनका लगा।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा।।
-मैथिलीशरण गुप्त : जयद्रथ वथ
स्थायी भाव-क्रोध।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- अर्जुन।
(ख) विषय- शत्रु, जयद्रथ।
(2) उद्दीपन- श्रीकृष्ण के वचन, युद्ध के बाजे, शत्रुओं
की ललकार, जय जयकार।
अनुभाव- क्रोध से जलना, हाथ मलना, ललकारना, खड़े होना, शरीर काँपना।
संचारी भाव- स्मृति, उग्रात, गर्व , आवेग, चपलता।
6.वीभत्स रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित जुगुप्सा (घृणा) नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब वह (जुगुप्सा) वीभत्स रस के रूप में बदल जाता है।
उदाहरण- (1) कोउ अंतड़िनि की पहिरि माल इतराज दिखावत।
कोउ चरबी लै चोप सहित निज अंगनि लावत।।
कोउ मुण्डनि लै मानि मोद कन्दुक लौं डारत।
कोउ रुण्डनि तै बैठि करेजो फारि निकारत।।
-रत्नाकर : हरिश्चंद्र
यहां जुगुप्सा (घृणा) स्थायी भाव है। श्मशान का दृश्य उद्दीपन विभाव है। भूत, पिशाच आलम्बन। उनका नाचना, मुण्डों से खेलना अनुभाव है। निर्वेद, ग्लानि, दीनता आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण-(2) सिर पर बैैैठयो काग, आंंख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनन्द उर धारत।।
गीध जांघ को खोद-खोद कै मांस उचारत।
स्वान अंगुरिन काट-काट के खात निकारत।।
स्थायी भाव- जुगुप्सा (घृणा)
विभाव-(1) आलम्बन- (क)
आश्रय- हरिश्चंद्र, दर्शक, पाठक, श्रोता।
(ख) विषय-लाश।
(2) उद्दीपन- लाश का सड़ना, दुर्गन्ध फैलना, गिद्ध-कौओं का मांस नोचना, कुत्तों सियारों का मांस खाना, श्मशान का भयानक वातावरण, रात की भयंकरता।
अनुभाव- स्तम्भ, कम्प, स्वरभंग, आंसू, रोमांच, नाक बन्द करना, आंख बन्द करना, थू-थू करना, मुंह फेरना।
संचारी भाव- ग्लानि, विषाद, उन्माद, आवेग।
7.भयानक रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित भय नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (भय) भयानक रस के रूप में बदल जाता है।
उदाहरण- (1) नभ ते झटपट बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच।
कंपित तन व्याकुल नयन, लाबक हिल्यो न रंच।।
आकाश में झपटते हुए बाज को देखकर बेचारा लावा पक्षी सुध-बुध खो बैठा। उसका शरीर कांपने लगा और आंखों की ज्योति मन्द पड़ गयी।
यहां भय स्थायी भाव है। लावा पक्षी आश्रय तथा बाज आलम्बन है। बाज का झपटना उद्दीपन विभाव है तथा लावा का कांपना, अचेत होना संचारी भाव है।
उदाहरण- (2) एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय।
विकल बटोही बीच ही, परयो मुरछा खाय।।
स्थायी भाव- भय, डर।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) -आश्रय-बटोही
(ख) विषय-अजगर, शेर।
(2)उद्दीपन- अजगर और सिंह की चेष्टा, सुनसान वातावरण।
अनुभाव- स्तम्भ, कम्प, स्वरभंग,वैवण्र्य, आंसू, स्वेद, मूर्छा।
संचारी भाव- कम्प, स्वेद, आवेश,त्रास, मूर्छा, चिंता, शंका, दैन्य।
8. अद्भुत रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित विस्मय नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब वह (विस्मय) अद्भुत रस का रूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरण- (1) अखिल भुवन-चर-अचर, सब हरि-मुख में लखि मातु।
चकित भई गदगद बचन, विकसित दृग पुलकातु।।
-काव्यकल्पद्रुम
भगवान कृष्ण के मुख में सारे भुवनों, चर-अचर को देखकर माता यशोदा आश्चर्य चकित हो उठीं। इस उदाहरण में विस्मय स्थायी भाव है। कृष्ण का मुख आलम्बन, मुख में सारे भुवनों का दिखाना उद्दीपन तथा विस्फारित नेत्र, गदगद-स्वर, रोमांच आदि अनुभाव हैं। त्रास, दैन्य आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण- (2) बिनु पद चले सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।।
स्थायी भाव-विस्मय, आश्चर्य।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- श्रोता, पाठक।
(ख) विषय- ईश्वर, विचित्र कार्य, अलौकिक बातें।
(2) उद्दीपन- बिना पैर के चलना, बिना कान के सुनना, बिना हाथ के काम करना, बिना मुंह खाना, बिना वाणी के बोलना।
अनुभाव- स्तम्भ, रोमांच, दांतों तले अंगुली दबाना।
संचारी भाव- जड़ता, वितर्क, भ्रांति।
9. शांत रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित निर्वेद नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तो वह निर्वेद शांत रस का रूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरण- (1) सुत बनितादि जानि स्वारथरत न करू नेह सबही ते।
अंतहि तोहि तजेंगे पामर ! तू न तजै अबही ते।।
अब नाथहिं अनुराग जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम-आगिनी तुलसी कहुँ विषय भोग बहु घी ते।।
-तुलसी : विनय पत्रिका
यहां निर्वेद स्थायी भाव है। अनित्य संसार के सभी सुख-साधन-पुत्र, पत्नी आदि-आलम्बन हैं। इन्हें छोड़ देने का कथन अनुभाव है। घृति, मति, विमर्ष आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण- (2) अबलौं नसानी अब नसैहों।
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे पुनि न डसैहों।
पायो राम नाम चिंतामणि उर कर ते न खसैहों।
पर बस जानि हंस्यो इन इन्द्रिय निज बस व्है न हँसैहों।।
स्थायी भाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय-कवि, श्रोता,पाठक।
(ख) विषय-ईश्वर, I।
उद्दीपन- संसार की असारता, तीर्थ स्थान, पवित्र वातावरण, तपोभूमि, ईश्वर की शक्ति।
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित भय नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है, तब वह (भय) भयानक रस के रूप में बदल जाता है।
उदाहरण- (1) नभ ते झटपट बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच।
कंपित तन व्याकुल नयन, लाबक हिल्यो न रंच।।
आकाश में झपटते हुए बाज को देखकर बेचारा लावा पक्षी सुध-बुध खो बैठा। उसका शरीर कांपने लगा और आंखों की ज्योति मन्द पड़ गयी।
यहां भय स्थायी भाव है। लावा पक्षी आश्रय तथा बाज आलम्बन है। बाज का झपटना उद्दीपन विभाव है तथा लावा का कांपना, अचेत होना संचारी भाव है।
उदाहरण- (2) एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय।
विकल बटोही बीच ही, परयो मुरछा खाय।।
स्थायी भाव- भय, डर।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) -आश्रय-बटोही
(ख) विषय-अजगर, शेर।
(2)उद्दीपन- अजगर और सिंह की चेष्टा, सुनसान वातावरण।
अनुभाव- स्तम्भ, कम्प, स्वरभंग,वैवण्र्य, आंसू, स्वेद, मूर्छा।
संचारी भाव- कम्प, स्वेद, आवेश,त्रास, मूर्छा, चिंता, शंका, दैन्य।
8. अद्भुत रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित विस्मय नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से संयोग हो जाता है तब वह (विस्मय) अद्भुत रस का रूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरण- (1) अखिल भुवन-चर-अचर, सब हरि-मुख में लखि मातु।
चकित भई गदगद बचन, विकसित दृग पुलकातु।।
-काव्यकल्पद्रुम
भगवान कृष्ण के मुख में सारे भुवनों, चर-अचर को देखकर माता यशोदा आश्चर्य चकित हो उठीं। इस उदाहरण में विस्मय स्थायी भाव है। कृष्ण का मुख आलम्बन, मुख में सारे भुवनों का दिखाना उद्दीपन तथा विस्फारित नेत्र, गदगद-स्वर, रोमांच आदि अनुभाव हैं। त्रास, दैन्य आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण- (2) बिनु पद चले सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।।
स्थायी भाव-विस्मय, आश्चर्य।
विभाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय- श्रोता, पाठक।
(ख) विषय- ईश्वर, विचित्र कार्य, अलौकिक बातें।
(2) उद्दीपन- बिना पैर के चलना, बिना कान के सुनना, बिना हाथ के काम करना, बिना मुंह खाना, बिना वाणी के बोलना।
अनुभाव- स्तम्भ, रोमांच, दांतों तले अंगुली दबाना।
संचारी भाव- जड़ता, वितर्क, भ्रांति।
9. शांत रस
परिभाषा- सहृदय के हृदय में स्थित निर्वेद नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तो वह निर्वेद शांत रस का रूप ग्रहण कर लेता है।
उदाहरण- (1) सुत बनितादि जानि स्वारथरत न करू नेह सबही ते।
अंतहि तोहि तजेंगे पामर ! तू न तजै अबही ते।।
अब नाथहिं अनुराग जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम-आगिनी तुलसी कहुँ विषय भोग बहु घी ते।।
-तुलसी : विनय पत्रिका
यहां निर्वेद स्थायी भाव है। अनित्य संसार के सभी सुख-साधन-पुत्र, पत्नी आदि-आलम्बन हैं। इन्हें छोड़ देने का कथन अनुभाव है। घृति, मति, विमर्ष आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण- (2) अबलौं नसानी अब नसैहों।
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे पुनि न डसैहों।
पायो राम नाम चिंतामणि उर कर ते न खसैहों।
पर बस जानि हंस्यो इन इन्द्रिय निज बस व्है न हँसैहों।।
स्थायी भाव- (1) आलम्बन- (क) आश्रय-कवि, श्रोता,पाठक।
(ख) विषय-ईश्वर, I।
उद्दीपन- संसार की असारता, तीर्थ स्थान, पवित्र वातावरण, तपोभूमि, ईश्वर की शक्ति।
अनुभाव- कम्प, स्वरभंग,वैवण्र्य,
आँसू, रोमांच, मन को वश में करने का संकल्प।
संचारी भाव- स्मृति, चिंता, हर्ष, स्मरण, प्रन्य, असूया।
10.वात्सल्य रस
परिभाषा-सहृदय के हृदय में स्थित वात्सल्य नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग हो जाता है तो वह वात्सल्य रस के रूप में बदल जाता है।
उदाहरण- (1) माँ-फिर एक किलक दूरागत गूँज उठी उस कुुटिया सुनी,
माँ उठ दौड़ी भरे हृदय में लेकर उत्कंठा दूनी।
लुटरी खुली अलक, रज-धूसर बाहें आकर लिपट गई,
निशा तापसी की जलने को धधक उठी बुझती धुनी।।
यहां वात्सल्य स्थायी भाव है। श्रद्धा आश्रय है और बालक मानव आलम्बन है। 'माँ' कहकर पुकारना, किलकारी मारना आदि उद्दीपन विभाव है। गोद मे लेना और प्यार करना अनुभाव है। औत्सुक्य, हर्ष आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण- (2) मैया कबहिं बढैगी चोटी।
किती बार मोहि दूध पियत भई यह अजहूँ हैं छोटी।।
-सूरदास
उदाहरण- (3)
कौशल्या जब बोलन जाई, ठुमुक-ठुमुक प्रभु चलहिं पराई।
भोजन करत बोलावत राजा, नहि आवत तजि बाल समाजा।
धुसर धुरि भरे तनु आये, भूपति बिहँसि गोद बैठाए ।।
स्थायी भाव - पुत्र प्रेम, वात्सल्य।
विभाव - (1) आलम्बन- (क) आश्रय - राजा, दशरथ व माता कौशल्या।
(ख) विषय- राम
(2) उद्दीपन - राम का सौंदर्य, उनकी शरारतें, उनका भागना, दौड़ना, जिद करना, धूल-धूसरित होना।
अनुभाव-रोमांच, हँसना, गोद में बैठाना, बुलाना, पीछे-पीछे दौड़ाना ।
संचारी भाव-हर्ष, आनन्द, उन्माद, स्मृति, गर्व