गति के समीकरण (Equations of Motion) – 20 न्यूमेरिकल ▫️ उपयोगी सूत्र 1. v = u + at 2. s = ut + 1/2at2 3. v^2 = u^2 + 2as ⸻ प्रश्न 1.एक वस्तु विराम से चलकर 4 m/s² के त्वरण से 5 s तक चलती है। अंतिम वेग ज्ञात कीजिए। हल: u = 0, a = 4 m/s², t = 5 s v = u + at v = 0 + (4 × 5) = 20 m/s ⸻ प्रश्न 2. एक साइकिल 2 m/s के वेग से चल रही है। 3 m/s² के त्वरण से 4 s तक चलती है। अंतिम वेग ज्ञात कीजिए। हल: u = 2, a = 3, t = 4 v = u + at = 2 + 12 = 14 m/s ⸻ प्रश्न 3. एक धावक 10 m/s के वेग से चल रहा है। 2 m/s² के ऋणात्मक त्वरण से 5 s में रुक जाता है। विस्थापन ज्ञात कीजिए। हल: u = 10, a = –2, t = 5 s = ut + ½at² s = (10×5) + ½(–2)(25) s = 50 – 25 = 25 m ⸻ प्रश्न 4. एक ट्रेन 20 m/s के वेग से चल रही है और 1 m/s² से धीमी होती है। रुकने तक चली दूरी ज्ञात कीजिए। हल: u = 20, v = 0, a = –1 v² = u² + 2as 0 = 400 – 2s s = 200 m ⸻ प्रश्न 5. एक स्कूटर विराम से चलकर 2.5 m/s² के त्वरण से 8 s में चलता है। दूरी ज्ञात कीजिए। हल: u = 0, a = 2.5, t = 8 s = ½at² = ½ × 2.5 × 64 = 80 m ⸻ प्रश्न 6. एक कार 10 m/s से...
CG सामान्य ज्ञान एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल
Welcome to छतीसगढ़ -
भारत के सबसे बड़े राज्य मध्यप्रदेश के दो हिस्से कर 1 नवम्बर,2000 को अस्तित्व में आया छतीसगढ़ देश का 26वां राज्य है। यह प्राकृतिक संपदा से भरपूर हैं और इसे सम्पन्न बनाने में प्रकृति ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। यहाँ खनिजों की भरमार है, घने पेड़ों से आच्छादित वन संपदा है और उपजाऊ भूमि की बहुतायत है। कोयला, बाक्साइट, ताम्बा, लौह अयस्क, सीसा, और चांदी के साथ डोलोमाइट और लाइम स्टोन से छत्तीसगढ़ भरा है। प्रदेश की विशाल वन संपदा जहां अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी तो दिखाती ही है, साथ ही वन्य जीवों के लिए नैसर्गिक माहौल भी उपलब्ध कराती है। खनिज तथा वन संपदा से भरे इस राज्य को अब महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र बनाये जाने की तैयारियां शुरू की गई हैं। सीमेंट, लोहा, इस्पात, अल्युमीनियम, केमिकल्स, जूट, कागज, तथा हैण्डीक्राफ्ट आदि इस राज्य के महत्वपूर्ण औद्योगिक उत्पाद हैं। छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में कृषि भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यहाँ धान के खेत सर्वत्र फैले हुए हैं इसी कारण इस क्षेत्र को " धान का कटोरा " कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ की शानदार ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत है जिसका उल्लेख महाभारत और रामायण जैसे पौराणिक ग्रंथों में कौशल के नाम से मिलता है। विभिन्न साम्राज्य जैसे मौर्य, सातवाहन, वकातक, गुप्तवंश, नलवंश, पांडुवंश, सोमवंशी, नागवंशी, माडलिक और कलचुरी आदि प्रमुख हैं जो इस क्षेत्र से जुड़े रहे। 1732 से 1818 की अवधि में यह प्रदेश मराठों के अधीन रहा और बाद में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना होने के बाद इसे नागपुर प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया। आदिवासी जातियों की बहुतायत होने से छत्तीसगढ की अपनी अलग रंगीन सांस्कृतिक धरोहर है। इस राज्य में छोटी-बड़ी कुल 35 आदिवासी जातियां हैं जो पुरे प्रदेश में फैली हुयी हैं। इन जातियों के थिरकते लोकनृत्य, मदमाता संगीत और आकर्षक लोकनाटक पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। पौराणिक हिन्दू ग्रन्थ महाभारत पर आधारित संगीतमय नृत्य-नाटिका " पंडवानी " राज्य की प्रमुख नृत्य-नाटिका है जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर यह राज्य अपने हैरत अंगेज कीर्तिस्तम्भों की बदौलत देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक हैं। आदिवासियों के मंत्रमुग्ध कर देने वाले लोकनृत्यों, गहरी गुफाओं, विशाल किलों और आश्चर्य किलों और आश्चर्यकित कर देने वाला प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों के मन पर गहरी छाप डालता है।
भारत के सबसे बड़े राज्य मध्यप्रदेश के दो हिस्से कर 1 नवम्बर,2000 को अस्तित्व में आया छतीसगढ़ देश का 26वां राज्य है। यह प्राकृतिक संपदा से भरपूर हैं और इसे सम्पन्न बनाने में प्रकृति ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। यहाँ खनिजों की भरमार है, घने पेड़ों से आच्छादित वन संपदा है और उपजाऊ भूमि की बहुतायत है। कोयला, बाक्साइट, ताम्बा, लौह अयस्क, सीसा, और चांदी के साथ डोलोमाइट और लाइम स्टोन से छत्तीसगढ़ भरा है। प्रदेश की विशाल वन संपदा जहां अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी तो दिखाती ही है, साथ ही वन्य जीवों के लिए नैसर्गिक माहौल भी उपलब्ध कराती है। खनिज तथा वन संपदा से भरे इस राज्य को अब महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र बनाये जाने की तैयारियां शुरू की गई हैं। सीमेंट, लोहा, इस्पात, अल्युमीनियम, केमिकल्स, जूट, कागज, तथा हैण्डीक्राफ्ट आदि इस राज्य के महत्वपूर्ण औद्योगिक उत्पाद हैं। छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में कृषि भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यहाँ धान के खेत सर्वत्र फैले हुए हैं इसी कारण इस क्षेत्र को " धान का कटोरा " कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ की शानदार ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत है जिसका उल्लेख महाभारत और रामायण जैसे पौराणिक ग्रंथों में कौशल के नाम से मिलता है। विभिन्न साम्राज्य जैसे मौर्य, सातवाहन, वकातक, गुप्तवंश, नलवंश, पांडुवंश, सोमवंशी, नागवंशी, माडलिक और कलचुरी आदि प्रमुख हैं जो इस क्षेत्र से जुड़े रहे। 1732 से 1818 की अवधि में यह प्रदेश मराठों के अधीन रहा और बाद में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना होने के बाद इसे नागपुर प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया। आदिवासी जातियों की बहुतायत होने से छत्तीसगढ की अपनी अलग रंगीन सांस्कृतिक धरोहर है। इस राज्य में छोटी-बड़ी कुल 35 आदिवासी जातियां हैं जो पुरे प्रदेश में फैली हुयी हैं। इन जातियों के थिरकते लोकनृत्य, मदमाता संगीत और आकर्षक लोकनाटक पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। पौराणिक हिन्दू ग्रन्थ महाभारत पर आधारित संगीतमय नृत्य-नाटिका " पंडवानी " राज्य की प्रमुख नृत्य-नाटिका है जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर यह राज्य अपने हैरत अंगेज कीर्तिस्तम्भों की बदौलत देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक हैं। आदिवासियों के मंत्रमुग्ध कर देने वाले लोकनृत्यों, गहरी गुफाओं, विशाल किलों और आश्चर्य किलों और आश्चर्यकित कर देने वाला प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों के मन पर गहरी छाप डालता है।
प्रमुख दर्शनीय स्थल -
धमतरी
धमतरी की उपजाऊ एवं सुंदर धरती पर कई नदिया बहती है, जिनमें महानदी एवं सेंदूर प्रमुख हैं।
धमतरी से भ्रमण
गंगरेल बांध(13किमी) : इस बांध पर पिकनिक का आनन्द लिया जाता है।
गंगरेल बांध(13किमी) : इस बांध पर पिकनिक का आनन्द लिया जाता है।
सीतानदी अभ्यारण्य : 553 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस अभ्यारण्य में बाघ, सांभर एवं हिरन पाए जाते हैं।
सिहावा(65 किमी) : यह स्थल महानदी का उद्गम स्थल है और प्रसिद्ध संत हरिंनजी का आश्रम यहीं स्थित है। यहाँ के अन्य पर्यटक स्थलों में कर्णेश्वर मंदिर, गणेश घाट, हाथी खोह, दंतेश्वरी या सरोवर गुफा, अमृत कुंड और महामाई मंदिर आदि है।
बरनावापाड़ा : यह वन्य जीव अभयारण्य रायपुर से 103 किमी दूर स्थित है। 244 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस अभ्यारण्य में मुख्यत: पाए जाने वाले जानवरों में बाघ, जंगली भैंसा और भालू आदि हैं।
दुर्ग
रायपुर से 35 किमी की दूरी पर स्थित दुर्ग घने जंगलों एवं खनिज भंडार के लिए जाना जाता है।
दुर्ग से भ्रमण
भिलाई (10 किमी ) : इस्पात शहर के नाम से प्रसिद्ध भिलाई में भारत का पहला निजी क्षेत्र का इस्पात कारखाना यहीं स्थापित किया गया हैं। रूस की सहायता से स्थापित इस कारखाने में अति आधुनिक उपकरणों एवं तकनीक द्वारा इस्पात का निर्माण किया जाता है।
आधुनिक सुविधा सम्पन्न एवं उत्कृष्ट तरीके से बसाई गई भिलाई टाउनशिप में भारत और रूस की सरकारों के सहयोग से विकसित मैत्रीबाग नामक प्रसिद्ध बगीचा हैं जो भारत एवं रूस की मैत्री का प्रतीक है। 100 एकड़ क्षेत्र में फैले इस बगीचे में चिड़ियाघर भी है जहां देश-विदेश के पशु-पक्षी देखे जा सकते हैं।
रायपुर से 35 किमी की दूरी पर स्थित दुर्ग घने जंगलों एवं खनिज भंडार के लिए जाना जाता है।
दुर्ग से भ्रमण
भिलाई (10 किमी ) : इस्पात शहर के नाम से प्रसिद्ध भिलाई में भारत का पहला निजी क्षेत्र का इस्पात कारखाना यहीं स्थापित किया गया हैं। रूस की सहायता से स्थापित इस कारखाने में अति आधुनिक उपकरणों एवं तकनीक द्वारा इस्पात का निर्माण किया जाता है।
आधुनिक सुविधा सम्पन्न एवं उत्कृष्ट तरीके से बसाई गई भिलाई टाउनशिप में भारत और रूस की सरकारों के सहयोग से विकसित मैत्रीबाग नामक प्रसिद्ध बगीचा हैं जो भारत एवं रूस की मैत्री का प्रतीक है। 100 एकड़ क्षेत्र में फैले इस बगीचे में चिड़ियाघर भी है जहां देश-विदेश के पशु-पक्षी देखे जा सकते हैं।
देवबालोद ( 3किमी ) : भगवान शिव के प्राचीन मंदिर के लिए प्रसिद्ध ।
तांदुला बांध ( 64 किमी ) : तांदुला नदी पर स्थित तांदुला बांध एक पिकनिक स्थल के रूप में ख्याति पा रहा है।
नागपुरा ( 14 किमी ) : सीनोत नदी के किनारे बसा यह स्थान जैन धर्म का धार्मिक स्थल है और जैन धर्म के 23 वें तीर्थकर भगवान पारसनाथ के अद्भुत मंदिर के लिए विख्यात है। इस मंदिर के दर्शनों के लिए लाखों लोग भारत एवं विश्व से यहाँ आते हैं।
जांजगीर
कलचूरी वंश के महाराजा जाजवालया देव की नगरी, भगवान विष्णु के मंदिर के लिये प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण 12 वीं शताब्दी में शुरू हुआ किन्तु यह आज भी पूर्ण नहीं हो सका।
कलचूरी वंश के महाराजा जाजवालया देव की नगरी, भगवान विष्णु के मंदिर के लिये प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण 12 वीं शताब्दी में शुरू हुआ किन्तु यह आज भी पूर्ण नहीं हो सका।
जांजगीर से भ्रमण
पीथमपुर : इस स्थान पर अनेक मंदिर हैं लेकिन उनमें सबसे प्रमुख है कालेश्वर महादेव का मंदिर। इस शहर में भगवान शिव का विवाह बड़ी धूमधाम से आयोजित किया जाता है और यह बड़े समारोह का रूप ले लेता है।
पीथमपुर : इस स्थान पर अनेक मंदिर हैं लेकिन उनमें सबसे प्रमुख है कालेश्वर महादेव का मंदिर। इस शहर में भगवान शिव का विवाह बड़ी धूमधाम से आयोजित किया जाता है और यह बड़े समारोह का रूप ले लेता है।
चाम्पा : यह एक प्राचीन ऐतिहासिक शहर है। यहाँ प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं - समलेश्वरी देवी का मंदिर , राजमहल और रामबंधा तथा चाम्पा से 17 किमी दूर मदवारानी मंदिर।
शिबरी नारायण : महानदी के किनारे पर स्थित शिबरी नारायण हिन्दू धर्मवलंबियों के लिए तीर्थ स्थान है। कहते हैं भगवान राम, वनवास के दौरान यहाँ आये थे और यहाँ की एक ग्रामीण महिला शबरी ने उन्हें बेर खाने को दिए। बेर मीठे हैं, यह जानने के लिए शबरी ने उन्हें थोड़ा चख लिया था और भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर भी बड़े प्रेम से खाए थे। यहाँ के अन्य दर्शनीय स्थल हैं - नारायण मंदिर और चंद्रा - चुड़ेश्वर मंदिर।
खरोद : छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात यह शिबरी नारायण से मात्र 5 किमी दूर है। यहाँ भगवान शिव का प्राचीन मंदिर लक्ष्मणेश्वर है जहाँ हर साल महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है।
जगदलपुर
रायपुर से 299 किमी दूर यह बस्तर का जिला मुख्यालय है। इन्द्रावती नदी के मुहाने पर बसा जगदलपुर एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं हस्त शिल्प केंद्र है।
बस्तर जिले में विभिन्न आदिवासी जातियों का निवास हैं। इस जिले में बसने वाली प्रमुख जातियां हैं -गोडं, भत्रा, उर्नव, कोरवा, कोल, हल्बा एवं मडिया। इस जिले में कई पारंपरिक मेले तथा त्यौहार आयोजित होते रहते हैं। इसके अलावा यहाँ लोक संगीत, लोक नृत्य एवं लोक नाटकों का आयोजन भी किया जाता है। इन समारोहों में कई दुर्लभ प्राचीन एवं ग्रामीण वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है जो पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।
मानव विज्ञान संग्रहालय : इसमें राज्य निर्मित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं मनोरंजन से संबंधित वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।
जिला प्राचीन संग्रहालय : पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा स्थापित इस संग्रहालय में प्राचीन धरोहरों को प्रदर्शित किया गया है।
डांसिंग कैक्टस : यह कला केंद्र बस्तर के विख्यात कला संसार की अनुपम भेंट हैं। यहीं पर एक प्रशिक्षण संस्थान भी स्थापित है।
रायपुर से 299 किमी दूर यह बस्तर का जिला मुख्यालय है। इन्द्रावती नदी के मुहाने पर बसा जगदलपुर एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं हस्त शिल्प केंद्र है।
बस्तर जिले में विभिन्न आदिवासी जातियों का निवास हैं। इस जिले में बसने वाली प्रमुख जातियां हैं -गोडं, भत्रा, उर्नव, कोरवा, कोल, हल्बा एवं मडिया। इस जिले में कई पारंपरिक मेले तथा त्यौहार आयोजित होते रहते हैं। इसके अलावा यहाँ लोक संगीत, लोक नृत्य एवं लोक नाटकों का आयोजन भी किया जाता है। इन समारोहों में कई दुर्लभ प्राचीन एवं ग्रामीण वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है जो पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।
मानव विज्ञान संग्रहालय : इसमें राज्य निर्मित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं मनोरंजन से संबंधित वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।
जिला प्राचीन संग्रहालय : पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा स्थापित इस संग्रहालय में प्राचीन धरोहरों को प्रदर्शित किया गया है।
डांसिंग कैक्टस : यह कला केंद्र बस्तर के विख्यात कला संसार की अनुपम भेंट हैं। यहीं पर एक प्रशिक्षण संस्थान भी स्थापित है।
जगदलपुर से भ्रमण
कोंडागांव ( 76 किमी ) : "शिल्पग्राम" के नाम से प्रसिध्द यह जगह जगदलपुर के उत्तर में स्थित है। इसकी स्थापना अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्पी जयदेव भाघेल के प्रयासों से ही संभव हुई है।
कोंडागांव ( 76 किमी ) : "शिल्पग्राम" के नाम से प्रसिध्द यह जगह जगदलपुर के उत्तर में स्थित है। इसकी स्थापना अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्पी जयदेव भाघेल के प्रयासों से ही संभव हुई है।
केशकाल ( 130 किमी ) : राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 43 पर स्थित इस कस्बे में अद्भुत प्राकृतिक छटा के साथ तेलिन माता का मंदिर और एक प्रासाद के दर्शन भी किये जा सकते हैं।
पंचवटी : केशकाल से मात्र दो किमी दूर यह पर्यटन स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 43 पर तालुक मुख्यालय है। वन विभाग द्वारा विकसित इसे " छत्तीसगढ़ की पंचवटी " के नाम से भी जाना जाता है।
कोटमासर ( 40 किमी ) : कोटमासर को हैरत अंगेज प्राकृतिक भूमिगत गुफा के लिए जाना जाता है जो विश्व में अपनी तरह की एक मात्र गुफा है। यह गुफा लगभग साढ़े चार हजार फुट लंबी है और भूमितल से लगभग 60-215 फुट गहराई पर स्थित है। चुने और पानी से बनी इस सुंदर गुफा से कहीं-कहीं शिवलिंग का आभास भी होता है। इस गुफा का प्रवेश द्वारा केवल पांच फुट ऊँचा और तीन फुट चौड़ा है तथा इसमें पांच कक्ष बने हैं।
इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान : (200किमी)
रायपुर से 490 किमी दूर जंगलों के बीच बनाया गया इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान 1258 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख जानवर हैं - तेंदुआ, जंगली भैसा, हिरन आदि।
रायपुर से 490 किमी दूर जंगलों के बीच बनाया गया इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान 1258 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख जानवर हैं - तेंदुआ, जंगली भैसा, हिरन आदि।
कांकेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान ( 30 किमी ) : 200 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस उद्यान में पहाड़ियां, घाटियां, झरने तथा गुफाएं आदि हैं। यह उद्यान चारों ओर से कोविदार, बांस एवं सागौन के घने पेड़ों से घिरा है। इस उद्यान में शेर, चीता, बाघ, तेंदुआ, हिरन, भालू, सांप, मैना और कोयल आदि भी देखे जा सकते हैं। भैंसा दरहा अजगर संरक्षण क्षेत्र यहाँ नजदीक कांकेर घाटी के कांगेर खोलब मुहाने पर स्थित है। एशिया का पहला जीवोध्यान भी यहीं स्थित है। इसका प्रमुख आकर्षण पुरातत्व पेड़ों पर चिन्ह अंकित करना है।
भैरामगढ़ अभ्यारण्य ( 139 किमी ) : इन्द्रावती नदी के किनारे पर स्थित इस अभ्यारण्य की स्थापना 1983 में की गई थी। 139 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस अभ्यारण्य में चीता, बाघ, तेंदुआ, सांभर, जंगली भैंसा एवं बारहसिंगा इत्यादि प्रमुख हैं।
पामेद वन्यजीव अभ्यारण्य ( 155 किमी ) : यह बस्तर का दूसरा प्रमुख वन्यजीव अभ्यारण्य है। 262 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस क्षेत्र में मुख्य रूप से जंगली भैंसा पाया जाता है। अन्य जानवरों में तेंदुआ, बाघ, हिरन इत्यादि हैं।
भैंसा दरहा : यह प्रदेश का एकमात्र मगरमच्छ संरक्षण क्षेत्र है।
चित्रकूट ( 40 किमी ) : चित्रकूट की प्राकृतिक छटा दर्शनीय है। इन्द्रावती नदी पर 90 फुट की ऊंचाई से गिरते झरने को देखना रोमांचक अनुभव है। यहाँ मछली पकड़ने, नाव चलाना और तैराकी की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। जगदलपुर से मात्र 40 किमी दूर यह रमणीक स्थल प्राकृतिक सौन्दर्य का लुत्फ उठाने वाले पर्यटकों को स्वत: ही आकर्षित करता है।
हाथी दरहा : मतनेर जल प्रपात की वजह से पहचाना जाने वाला हाथी दरहा चित्रकूट से मात्र 3 किमी की दुरी पर स्थित है। यह लगभग 100 फुट की ऊंचाई से गिरता है। अंग्रेजी के यू शब्द के आकार वाली घाटी जो 150-200 गहरी है, इस क्षेत्र की सबसे गहरी घाटी है।
तीर्थगढ़ : कांकेर नदी पर बना तीर्थस्थल पर्यटकों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। यह जगदलपुर से 38 किमी दूर कांगेर राष्ट्रीय उद्यान पर बना हुआ है।
कांगेर धारा और कुंआरा सौन्दर्य : तीर्थगढ़ पर आकर्षक झरने के निर्माण के पश्चात् कांगेर नदी आठ - दस हिस्सों में बंट जाती है और कांगेर धारा इनमें से ही एक है। यहाँ हजारों वर्ष पुरानी चट्टानें और हाथीनुमा पत्थर हैं इसी कारण इसे " कुंआरा सौन्दर्य " के नाम से पुकारा जाता है।
बस्तर के मेले एवं त्यौहार
दशहरा : बस्तर का दशहरा समारोह विश्व प्रसिद्ध है। दशहरा यूं तो पुरे देश में मनाया जाता है लेकिन बस्तर की आदिवासी जातियों के इसे मनाने का अपना अलग ही अंदाज है। यहाँ के आदिवासी अपनी कुलदेवी माँ दंतेश्वरी की परिक्रमा कर दशहरा मनाते हैं। अक्टूबर - नवम्बर में मनाये जाने वाले इस पर्व की शुरुआत हरियाली अमावस्या को स्थानीय देवी कच्छिनगुड़ी, माँ दंतेश्वरी, भगवान हनुमान एवं भगवान विष्णु की पूजा अर्चना से होती है। इस दौरान यहाँ दो रथयात्राएं ' फूल रथ ' और ' विजय रथ ' भी आयोजित की जाती है। दशहरे के दिन मारिया और ध्रुवा नाम की दो आदिवासी जातियों के लोगों द्वारा रथ को चुरा कर कुम्हाडा कोट नामक स्थान पर छोड़ दिया जाता है। तत्पश्चात देवी की पूजा की जाती है और फिर रथ को वापस देवी माँ दंतेश्वरी के मंदिर पर लाया जाता है। पूरी रात चलने वाले इस समारोह में हजारों आदिवासी रथ को खींचते हुए माँ दंतेश्वरी के मंदिर पर लाते हैं। नवरात्रि का अंतिम दिन नवखानी के नाम से जाना जाता है। इस विशेष दिन से ही नई फसल की पैदावार को उपयोग शुरू किया जाता है।
दशहरा : बस्तर का दशहरा समारोह विश्व प्रसिद्ध है। दशहरा यूं तो पुरे देश में मनाया जाता है लेकिन बस्तर की आदिवासी जातियों के इसे मनाने का अपना अलग ही अंदाज है। यहाँ के आदिवासी अपनी कुलदेवी माँ दंतेश्वरी की परिक्रमा कर दशहरा मनाते हैं। अक्टूबर - नवम्बर में मनाये जाने वाले इस पर्व की शुरुआत हरियाली अमावस्या को स्थानीय देवी कच्छिनगुड़ी, माँ दंतेश्वरी, भगवान हनुमान एवं भगवान विष्णु की पूजा अर्चना से होती है। इस दौरान यहाँ दो रथयात्राएं ' फूल रथ ' और ' विजय रथ ' भी आयोजित की जाती है। दशहरे के दिन मारिया और ध्रुवा नाम की दो आदिवासी जातियों के लोगों द्वारा रथ को चुरा कर कुम्हाडा कोट नामक स्थान पर छोड़ दिया जाता है। तत्पश्चात देवी की पूजा की जाती है और फिर रथ को वापस देवी माँ दंतेश्वरी के मंदिर पर लाया जाता है। पूरी रात चलने वाले इस समारोह में हजारों आदिवासी रथ को खींचते हुए माँ दंतेश्वरी के मंदिर पर लाते हैं। नवरात्रि का अंतिम दिन नवखानी के नाम से जाना जाता है। इस विशेष दिन से ही नई फसल की पैदावार को उपयोग शुरू किया जाता है।
गोंचा पर्व : दशहरा समारोह के दौरान ही एक अन्य रथ यात्रा आयोजित की जाती है जो गोंचा पर्व के नाम से प्रसिद्ध है। इस पर्व के दौरान एक लंबे खाली बांस से पेंग नाम के फल से बनी गोलियों को दागा जाता है।
बिलासपुर
अरपा नदी के किनारे पर बसा बिलासपुर छत्तीसगढ़ का मुख्य औद्योगिक नगर है। बिलासपुर के आस पास प्रमुख दर्शनीय स्थल है- कानन पंडेरी ( वन्य जीव संरक्षण उद्यान ), विवेकानन्द पार्क, श्री दीनदयाल उपाध्याय स्मृति वन ( व्यापार विहार ), साई मंगलम ( व्यापार विहार ), श्री अयप्पा स्वामी मंदिर ( तिफरा ), काली मन्दिर ( तिफरा ), मारिमाइ मंदिर ( झोपड़ापाड़ा ),।
बिलासपुर कोसा रेशम एवं अच्छी किस्म के चावल के लिये भी जाना जाता है।
अरपा नदी के किनारे पर बसा बिलासपुर छत्तीसगढ़ का मुख्य औद्योगिक नगर है। बिलासपुर के आस पास प्रमुख दर्शनीय स्थल है- कानन पंडेरी ( वन्य जीव संरक्षण उद्यान ), विवेकानन्द पार्क, श्री दीनदयाल उपाध्याय स्मृति वन ( व्यापार विहार ), साई मंगलम ( व्यापार विहार ), श्री अयप्पा स्वामी मंदिर ( तिफरा ), काली मन्दिर ( तिफरा ), मारिमाइ मंदिर ( झोपड़ापाड़ा ),।
बिलासपुर कोसा रेशम एवं अच्छी किस्म के चावल के लिये भी जाना जाता है।
बिलासपुर से भ्रमण
रतनपुर ( 25 किमी ) : यह ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगर बिलासपुर से कठघोड़ा मार्ग पर स्थित है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रन्थ महाभारत में भी मिलता है और इसे कलचुरी और मराठा राजाओं की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त है। इस नगर की स्थापना महाराजा रतनदेव - प्रथम ने की थी और उन्हीं के नाम पर इसका नामकरण रतनपुर किया गया। यहाँ कई सुंदर झीलें और पहाड़ियाँ आई हुई हैं जो इसके सौन्दर्य में चार चाँद लगाती है। इसी कारण इसे छत्तीसगढ़ की " झीलों की नगरी " भी कहा जाता है। यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं - महामाया मन्दिर, रामपंचायत मन्दिर ( रामटेकरी ), बीस दुबरिया सती मंदिर, मूसे खां की दरगाह आदि।
रतनपुर ( 25 किमी ) : यह ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगर बिलासपुर से कठघोड़ा मार्ग पर स्थित है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रन्थ महाभारत में भी मिलता है और इसे कलचुरी और मराठा राजाओं की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त है। इस नगर की स्थापना महाराजा रतनदेव - प्रथम ने की थी और उन्हीं के नाम पर इसका नामकरण रतनपुर किया गया। यहाँ कई सुंदर झीलें और पहाड़ियाँ आई हुई हैं जो इसके सौन्दर्य में चार चाँद लगाती है। इसी कारण इसे छत्तीसगढ़ की " झीलों की नगरी " भी कहा जाता है। यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं - महामाया मन्दिर, रामपंचायत मन्दिर ( रामटेकरी ), बीस दुबरिया सती मंदिर, मूसे खां की दरगाह आदि।
मल्हार ( 40 किमी ): इस प्राचीन स्थल पर गुफाओं में पातालेश्वर महादेव, देवरी और दंतेश्वरी देवी के मंदिर आये हुए हैं। अन्य दर्शनीय स्थलों में चारभुजा वाले भगवान विष्णु की प्राचीन मूर्ति है। एक संग्रहालय भी यहाँ की गई है जहाँ वैष्णव, शैव और जैन धर्मो की मुर्तिया संग्रहीत है।
तलागांव ( 30 किमी ) :इस प्राचीन स्थल पर देवरानी -जेठानी का मंदिर दर्शनीय है। जेठानी मंदिर हालांकि ध्वस्त हो गया है लेकिन देवरानी का मंदिर का अभी भी भारत की कला एवं संस्कृति की उत्कृष्ट झलक प्रस्तुत करता है। रूद्र शिव की अद्भुत मूर्ति पर्यटकों को आकर्षित करती है।
कबीर चबूतरा ( 41 किमी ) : कबीर पंथियों का पावन स्थल
बांगो ( 100 किमी ) : इस स्थान को मिनीमाता जलाशय तथा हसदेव - बांगो योजना के लिए जाना जाता है। महानदी की सहायक नदी हसदेव पर बना विशाल बांध दर्शनीय है। लगभग 6730 वर्ग किमी क्षेत्र में बना यह बांध ढाई किमी चौड़ा एवं 87 मीटर ऊंचा है।
केंदाई जल प्रपात ( 132 किमी ) : यह आकर्षक जल प्रपात पहाड़ी नदी से 200 फुट की ऊंचाई से गिरता है तथा यहाँ पर्यटकों को अनोखा रोमांचक अनुभव होता है।
दंतेवाड़ा
जगदलपुर से 55 किमी की दूरी पर स्थित दंतेवाड़ा दंतेश्वरी देवी के मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह प्रसिद्ध मन्दिर शान्खिनी व दुनकिनी नदियों के संगम पर बनाया गया है। इसका निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी ने किया था।
जगदलपुर से 55 किमी की दूरी पर स्थित दंतेवाड़ा दंतेश्वरी देवी के मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह प्रसिद्ध मन्दिर शान्खिनी व दुनकिनी नदियों के संगम पर बनाया गया है। इसका निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी ने किया था।
दंतेवाडा से भ्रमण
बारसूर ( 75 किमी ) : यह छोटा-सा कस्बा मन्दिरों के समूहों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ 11वीं व 12वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिरों में देवरली मंदिर, चद्रादित्य मन्दिर, मामा भांजा मन्दिर और बत्तीसी मंदिर प्रमुख है।
बारसूर ( 75 किमी ) : यह छोटा-सा कस्बा मन्दिरों के समूहों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ 11वीं व 12वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिरों में देवरली मंदिर, चद्रादित्य मन्दिर, मामा भांजा मन्दिर और बत्तीसी मंदिर प्रमुख है।
बोधघाट : बारसूर से 8 किमी पर स्थित बोधघाट के पास ही सात धारा पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है। यहाँ की प्राकृतिक छटा में इन्द्रावती नदी का पहाड़ों के बीच से गिरना चार चाँद लगा देता है।
किरनदूल ( बैलादिला ) ( 40 किमी ) : यह लौह अयस्क के लिए विश्व प्रसिद्ध है और यहाँ का अधिकांश लौह अयस्क जापान को निर्यात किया जाता है। यहाँ पहाड़ी पर बसे आदर्श नगर की प्राकृतिक छटा दर्शनीय है और यह मध्यप्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थल पचमढ़ी के सदृश है।
जशपुर
लोरो घाटी में स्थित जशपुर जिला मुख्यालय है। दर्शनीय स्थलों में बालाजी मन्दिर, देवी मन्दिर, शिव मन्दिर, राज निवास, रानी सती बाग, शांति भवन और चर्च शामिल हैं।
लोरो घाटी में स्थित जशपुर जिला मुख्यालय है। दर्शनीय स्थलों में बालाजी मन्दिर, देवी मन्दिर, शिव मन्दिर, राज निवास, रानी सती बाग, शांति भवन और चर्च शामिल हैं।
लोरो घाटी ( 15 किमी ) : इस फूलों की घाटी का प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता हैं।
रानीदाह जलप्रपात ( 19 किमी ) : यह सुंदर जलप्रपात पर्यटकों को लुभाने में सक्षम है। जलप्रपात के आस-पास जो अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं वे हैं - पांचभैया, आनन्दवन, फिश पाइन्ट, दूधधारा, रजतशिला और गिरमा घाटी आदि।
कुनकेरी ( 40 किमी ) : यहाँ स्थित जो प्रसिद्ध कैथोलिक चर्च है वो एशिया का दूसरा सबसे बड़ा कैथोलिक चर्च माना जाता है।
कांकेर
यह स्थान कई प्राचीन मन्दिरों के लिए विख्यात है। इसमें से प्रमुख हैं- राजसवल, जगन्नाथ मन्दिर, बालाजी मन्दिर, लक्ष्मीनारायण मन्दिर, कानकालिन माता मन्दिर, शीतला माता का मन्दिर और जोगी गुफा आदि।
यह स्थान कई प्राचीन मन्दिरों के लिए विख्यात है। इसमें से प्रमुख हैं- राजसवल, जगन्नाथ मन्दिर, बालाजी मन्दिर, लक्ष्मीनारायण मन्दिर, कानकालिन माता मन्दिर, शीतला माता का मन्दिर और जोगी गुफा आदि।
माँ सिंहवासिनी मन्दिर : यहाँ दुर्गा और काली के अवतार सिंहवासिनी देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है।
गाड़ियापहाड़ : कांकेर जिले का सबसे ऊँचा स्थान गाड़िया पहाड़ है जो " किला डूंगरी " के नाम से विख्यात है। यहाँ नजदीक ही सोनई-रूपाई के नाम से प्रसिद्ध सरोवर भी है।
भोरमदेव
यह स्थान 11वीं सदी में बनाये गये भोरमदेव मन्दिर के लिए विख्यात है तथा यह मन्दिर चंदेला स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। इस अद्भुत मन्दिर को " छत्तीसगढ़ का खजुराहो " भी कहा जाता है। मन्दिर पर नृत्य की आकर्षक भाव-भंगिमाएं के साथ-साथ हाथी,घोड़े, भगवान गणेश एवं नटराज की मूर्तियां उकेरी गई है।
यह स्थान 11वीं सदी में बनाये गये भोरमदेव मन्दिर के लिए विख्यात है तथा यह मन्दिर चंदेला स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। इस अद्भुत मन्दिर को " छत्तीसगढ़ का खजुराहो " भी कहा जाता है। मन्दिर पर नृत्य की आकर्षक भाव-भंगिमाएं के साथ-साथ हाथी,घोड़े, भगवान गणेश एवं नटराज की मूर्तियां उकेरी गई है।
चकरी महल : भोरमदेव के निकट यह स्थल भगवान शिव के 14वीं सदी में बनाए गए छोटे से मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है।
कोरबा
यह प्रदेश का प्रमुख औद्योगिक केंद्र है तथा कोरबा सुपर थर्मल पावर स्टेशन के लिए प्रसिद्ध है। इसके द्वारा उत्पादित बिजली का प्रयोग देश के प्रमुख औद्योगिक कारखानों जैसे भिलाई, बाल्को और कोरबा कोलफील्ड आदि द्वारा किया जाता है।
यह प्रदेश का प्रमुख औद्योगिक केंद्र है तथा कोरबा सुपर थर्मल पावर स्टेशन के लिए प्रसिद्ध है। इसके द्वारा उत्पादित बिजली का प्रयोग देश के प्रमुख औद्योगिक कारखानों जैसे भिलाई, बाल्को और कोरबा कोलफील्ड आदि द्वारा किया जाता है।
पाली : 9वीं सदी का शिव मन्दिर जो चारों ओर से दस्तकारी की उत्कृष्ट मिसाल है, इस शहर का प्रमुख आकर्षक है। पाली से 20 किमी दूर स्थित लाफा में पहाड़ी पर स्थित महामाया मन्दिर है। यहाँ अन्य दर्शनीय स्थलों में किला एवं शिवलिंग गुफाएं प्रमुख हैं।
सिरपुर ( श्रीपुर )
महासमुंद जिले में स्थित यह ऐतिहासिक नगर पहले श्रीपुर ( संपन्नता की नगरी ) के नाम से जाना जाता था। 5वीं से 8वीं शताब्दी तक कौशल की राजधानी रहे श्रीपुर में 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेग सांग का आगमन हुआ था। यह स्थान छठी से दसवीं शताब्दी तक बौध धर्म का महत्वपूर्ण स्थल रहा है जिसकी झलक यहाँ हर जगह देखी जा सकती है।
लक्ष्मण मन्दिर, आनन्द प्रभु, कुड़ी विहार, स्वास्तिक विहार, गंधेश्वर मन्दिर यहाँ के अन्य आकर्षक है।
महासमुंद जिले में स्थित यह ऐतिहासिक नगर पहले श्रीपुर ( संपन्नता की नगरी ) के नाम से जाना जाता था। 5वीं से 8वीं शताब्दी तक कौशल की राजधानी रहे श्रीपुर में 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेग सांग का आगमन हुआ था। यह स्थान छठी से दसवीं शताब्दी तक बौध धर्म का महत्वपूर्ण स्थल रहा है जिसकी झलक यहाँ हर जगह देखी जा सकती है।
लक्ष्मण मन्दिर, आनन्द प्रभु, कुड़ी विहार, स्वास्तिक विहार, गंधेश्वर मन्दिर यहाँ के अन्य आकर्षक है।
रायगढ़
यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में माना जाता है, यहाँ के कथक घराना, चक्रधर समारोह, कोसा रेशम एवं हस्तशिल्प प्रसिद्ध है। अन्य दर्शनीय स्थल - राधाकृष्ण मन्दिर, राजमहल व भुपदेवपुर झरना प्रमुख हैं।
यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में माना जाता है, यहाँ के कथक घराना, चक्रधर समारोह, कोसा रेशम एवं हस्तशिल्प प्रसिद्ध है। अन्य दर्शनीय स्थल - राधाकृष्ण मन्दिर, राजमहल व भुपदेवपुर झरना प्रमुख हैं।
रायगढ़ से भ्रमण
सिंहनपुर : यह स्थान पुरातत्व दृष्टि से महत्वपूर्ण बहुत वर्षों पुरानी कई गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है। जो पर्यटकों को आकर्षित करती है।
सिंहनपुर : यह स्थान पुरातत्व दृष्टि से महत्वपूर्ण बहुत वर्षों पुरानी कई गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है। जो पर्यटकों को आकर्षित करती है।
रामझरना ( 18 किमी ) : भूपदेवपुर शहर से मात्र 3 किमी दूर स्थित है। इस जगह पर अनेक सुंदर झरने बहते रहते हैं।
बादलखोल : 104.55 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इस वन्य जीव अभ्यारण्य में कई जानवरों एवं पक्षियों को विचरण करते देखा जा सकता है। यहाँ पाए जाने वाले जानवरों में बाघ, बारहसिंगा व सांभर प्रमुख हैं।
काबरा पहाड़ी : यहाँ पर कई प्राचीन गुफाएँ स्थित हैं जो चित्रकला एवं पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
सारनगढ़ : यह स्थान गिरीबीलस महल, गोमरदा अभ्यारण्य ( 60 किमी ), किनकेरी व केदार बांध, गुटका बांध और पुजारी पाली आदि हेतु प्रसिद्ध है।
धर्मजयगढ़ : इस स्थान को रेशम धागे के लिए जाना जाता है। यहाँ के अमली टिकरा और सिंसरिंगा घाट भी प्रसिद्ध है।
रायपुर
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर राज्य का प्रमुख व्यापारिक एवं औद्योगिक नगर है। यहाँ के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में महामाया मन्दिर, किला, प्राचीन सरोवर, भंडारपुरी, रहस्यमय शिव मन्दिर, महंत घासीदास संग्रहालय और रामकृष्ण मिशन प्रमुख हैं।
दूधधारी मठ : रायपुर के पुरानी बस्ती में स्थित यह मठ राजा जैतसिंह द्वारा 17वीं सदी में बनाया गया था। यहाँ का मठ प्रमुख केवल दूध ही पीता था इसलिए इसका नाम दूधधारी मठ हो गया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर राज्य का प्रमुख व्यापारिक एवं औद्योगिक नगर है। यहाँ के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में महामाया मन्दिर, किला, प्राचीन सरोवर, भंडारपुरी, रहस्यमय शिव मन्दिर, महंत घासीदास संग्रहालय और रामकृष्ण मिशन प्रमुख हैं।
दूधधारी मठ : रायपुर के पुरानी बस्ती में स्थित यह मठ राजा जैतसिंह द्वारा 17वीं सदी में बनाया गया था। यहाँ का मठ प्रमुख केवल दूध ही पीता था इसलिए इसका नाम दूधधारी मठ हो गया है।
रायपुर से भ्रमण
राजिम ( 45 किमी ) : इस स्थान को " छत्तीसगढ़ का प्रयाग " भी कहा जाता है। यहाँ पर तीन नदियों - महानदी, पैरी और सोनदुर का संगम होता है। प्राचीन मान्यतानुसार इस शहर को पहले कमलक्षेत्र और पदमपुर के नाम से जाना जाता था और भगवान विष्णु के मन्दिर के कारण यह धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात था। अन्य दर्शनीय स्थल - राजीव लोचन मन्दिर, कालेश्वर महादेव मन्दिर, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, राजिमा तेलिन का मन्दिर, रामचन्द्र मन्दिर, काल भैरव का मन्दिर, जगन्नाथ मन्दिर और ब्रह्मचर्य आश्रम आदि।
राजीव लोचन मन्दिर कमल नयन वाले भगवान विष्णु को समर्पित है। यहाँ आठवीं-दसवीं सदी में बनाई गई भगवान विष्णु की चार भुजा वाली आदमकद मूर्ति है। जगन्नाथपुरी की यात्रा करते समय यात्रियों का यह विश्रामस्थल है। माघपूर्णिमा पर एक माह चलने वाला मेला भी आयोजित किया जाता है। 14वीं - 15वीं सदी का कालेश्वर महादेव मन्दिर महानदी और पैरी नदी के किनारे छोटे से टापूनुमा हिस्से पर आया हुआ है।
राजिम ( 45 किमी ) : इस स्थान को " छत्तीसगढ़ का प्रयाग " भी कहा जाता है। यहाँ पर तीन नदियों - महानदी, पैरी और सोनदुर का संगम होता है। प्राचीन मान्यतानुसार इस शहर को पहले कमलक्षेत्र और पदमपुर के नाम से जाना जाता था और भगवान विष्णु के मन्दिर के कारण यह धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात था। अन्य दर्शनीय स्थल - राजीव लोचन मन्दिर, कालेश्वर महादेव मन्दिर, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, राजिमा तेलिन का मन्दिर, रामचन्द्र मन्दिर, काल भैरव का मन्दिर, जगन्नाथ मन्दिर और ब्रह्मचर्य आश्रम आदि।
राजीव लोचन मन्दिर कमल नयन वाले भगवान विष्णु को समर्पित है। यहाँ आठवीं-दसवीं सदी में बनाई गई भगवान विष्णु की चार भुजा वाली आदमकद मूर्ति है। जगन्नाथपुरी की यात्रा करते समय यात्रियों का यह विश्रामस्थल है। माघपूर्णिमा पर एक माह चलने वाला मेला भी आयोजित किया जाता है। 14वीं - 15वीं सदी का कालेश्वर महादेव मन्दिर महानदी और पैरी नदी के किनारे छोटे से टापूनुमा हिस्से पर आया हुआ है।
चंपारण्य ( 60 किमी ) : यह स्थल छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह वैष्णव धर्म के गुरु वल्लभाचार्यजी की जन्म स्थली है और पुश्तीमार्गीय संप्रदाय की उद्गमस्थली भी है। यहाँ प्रचलित मान्यता के अनुसार लक्ष्मण भट्ट जी अपनी गर्भवती पत्नी इल्मागुरुजी को समय पूर्व प्रसव पीड़ा हुई और उन्होंने यहाँ एक बालक को जन्म दिया जो कोई हरकत नहीं कर रहा था। लक्ष्मण भट्ट जी ने सोचा की यह बालक मृत ही जन्मा है और उन्होंने इस बालक को नजदीक ही पेड़ के खोल में डाल दिया। आश्चर्यजनक रूप से वह बालक सुबह जीवित पाया गया और आगे चलकर वल्लभाचार्यजी के नाम से प्रख्यात हुआ। वह पेड़ आज तक नहीं काटा गया है क्योंकि यहाँ के लोग मानते हैं यदि ऐसा किया गया तो भयानक संकट आ सकता है। गर्भवती महिलाओं को यहाँ से हटा दिया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है की गर्भवती महिलाओं के साथ भी वहीं घटित हो सकता है जो इल्मागुरुजी के साथ हुआ। गुरु वल्लभाचार्य जी के अनुयायियों ने उनकी याद में 20वीं सदी के प्रथम दशक में एक मन्दिर का निर्माण कराया है। हर वर्ष जनवरी-फरवरी में इस मन्दिर पर गुरु वल्लभाचार्य की जयंती के अवसर पर वार्षिक समारोह का आयोजन किया जाता है। यहाँ चंपकेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर भी है जहां शिवलिंग तीन हिस्सों में विभाजित है जिन्हें गणेश, पार्वती और शिव के नाम से जाना जाता है।
आरंग ( 34 किमी ) : यह एक प्राचीन मन्दिरों की नगरी है। यहाँ के प्रमुख मन्दिरों में भानदेवल मन्दिर, बागदेवल मन्दिर और महामाया का मन्दिर प्रमुख है। 11वीं सदी में निर्मित भानदेवल मन्दिर तत्कालीन स्थापत्य कला की उत्कृष्ट मिसाल है। इस मन्दिर के अंदर काले पत्थर से जैन तीर्थकरों की विशाल मूर्तियां बनी हुई है। खजुराहों मन्दिर की तरह ही यहाँ बागदेवल मन्दिर है। महामाया मन्दिर में विशाल चट्टान पर भी चौबीस जैन तीर्थकरों की मूर्तियां उकेरी गई हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल : चंडी मातेश्वरी मन्दिर, पंख्मुखी महादेव और पंचमुखी हनुमान मन्दिर।
नंदनवन ( 15 किमी ) : रायपुर के वन विभाग द्वारा खारों नदी के किनारे पर स्थित यह सुंदर बगीचा अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए विख्यात है। यहाँ के चिड़ियाघर में शेर, चीता, जंगली बिल्लियां, हिरन आदि देखे जा सकते हैं।
गिरौदपुरी : सतनामी समाज का यह धार्मिक स्थल संत घासीदास की जन्मस्थली है जिन्होंने सतनाम पंथ की स्थापना की। वार्षिक समारोह तथा फरवरी-मार्च महीने में 5-7 दिन चलने वाला नृत्य समारोह भी दर्शनीय है।
राजनांदगांव
राजनांदगांव जिला गोंड, कंवर, हल्बा आदि आदिवासी जनजातियों के लिए जाना जाता है। यहाँ के प्रमुख आकर्षक हैं - रियासतकालीन महल, गायत्री मन्दिर, बर्फानी आश्रम, रानीसागर के निकट चौपाटी, मुक्तिबोध स्मारक, त्रिवेणी संग्रहालय एवं जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय।
राजनांदगांव जिला गोंड, कंवर, हल्बा आदि आदिवासी जनजातियों के लिए जाना जाता है। यहाँ के प्रमुख आकर्षक हैं - रियासतकालीन महल, गायत्री मन्दिर, बर्फानी आश्रम, रानीसागर के निकट चौपाटी, मुक्तिबोध स्मारक, त्रिवेणी संग्रहालय एवं जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय।
राजनांदगांव से भ्रमण
डोंगरगढ़ ( 40 किमी ) : यह महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बमलेश्वरी ( बगुलामुखी ) देवी के प्राचीन मन्दिर के लिए विख्यात है। पहाड़ी पर स्थित बमलेश्वरी देवी का मन्दिर महाराज विक्रमादित्य के शासनकाल में डूंगरगढ़ के कामसेन ने बनवाया था। पहाड़ी के नीचे भी माँ बमलेश्वरी का छोटा मन्दिर है। नवरात्रि के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं का मेला सा लगा रहता है। अन्य दर्शनीय स्थलों में श्री बजरंग मन्दिर, माँ रनचंडी का मन्दिर, तापसी मन्दिर, सिद्ध बाबा की समाधि, महावीर मन्दिर, शीतला माता का मन्दिर, शिव मन्दिर, श्री दंतेश्वरी मन्दिर आदि प्रमुख हैं।
डोंगरगढ़ ( 40 किमी ) : यह महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बमलेश्वरी ( बगुलामुखी ) देवी के प्राचीन मन्दिर के लिए विख्यात है। पहाड़ी पर स्थित बमलेश्वरी देवी का मन्दिर महाराज विक्रमादित्य के शासनकाल में डूंगरगढ़ के कामसेन ने बनवाया था। पहाड़ी के नीचे भी माँ बमलेश्वरी का छोटा मन्दिर है। नवरात्रि के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं का मेला सा लगा रहता है। अन्य दर्शनीय स्थलों में श्री बजरंग मन्दिर, माँ रनचंडी का मन्दिर, तापसी मन्दिर, सिद्ध बाबा की समाधि, महावीर मन्दिर, शीतला माता का मन्दिर, शिव मन्दिर, श्री दंतेश्वरी मन्दिर आदि प्रमुख हैं।
खैरागढ़ ( 39 किमी) : यह स्थान इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के लिए प्रसिद्ध है जो एशिया में अपनी तरह का एक ही हैं। दर्शनीय स्थल - रूख्खड़ स्वामी का मन्दिर, श्री माँ दंतेश्वरी मन्दिर, श्री महाकाली मन्दिर, महावीर मन्दिर व माँ भद्रकाली का मन्दिर आदि।
डोंगरगांव : यह स्थान सिद्धशक्ति बालेश्वरी मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। अन्य आकर्षणों में पहाड़ी पर बनी बुद्ध की 30 फुट ऊंची प्रतिमा है।
घाटियारी : यह स्थान मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध है।
अम्बिकापुर
यह शहर सरगुजा का जिला मुख्यालय है। मान्यता है की भगवान श्री राम अपने वनवास के दौरान सरगुजा आये थे। यहाँ के प्राचीन मन्दिरों के अवशेष देखने योग्य है।
यह शहर सरगुजा का जिला मुख्यालय है। मान्यता है की भगवान श्री राम अपने वनवास के दौरान सरगुजा आये थे। यहाँ के प्राचीन मन्दिरों के अवशेष देखने योग्य है।
अम्बिकापुर से भ्रमण
चांगभाकर : यह नगर कलचुरी व चौहान शासकों द्वारा निर्मित प्राचीन मन्दिरों के लिए विख्यात है।
चांगभाकर : यह नगर कलचुरी व चौहान शासकों द्वारा निर्मित प्राचीन मन्दिरों के लिए विख्यात है।
मैनपात ( 45 किमी ) : सातूपारा पर्वत श्रृंखला के मध्य में समुद्रतल से 3500 फुट ऊंचाई पर बसा यह स्थल छत्तीसगढ़ का शिमला के नाम से प्रसिद्ध हो रहा है। 1962 के युद्ध में तिब्बत शरणार्थियों के आगमन के बाद चर्चा में आया था। यहाँ पर तिब्बती संस्कृति और बौद्ध धर्म की झलक देखी जा सकती है। दलाई लामा की जयंती समारोह यहाँ का प्रमुख उत्सव है जिसे यहाँ के लोग धूमधाम से मनाते हैं। इस समारोह में याक का नृत्य दर्शनीय होता है। यह स्थान ऊनी कपड़ों और कालीन के लिए भी जाना जाता है।
रामगढ़ : यहाँ पर भारत का प्राचीनतम थियेटर है। ऐसी मान्यता है की श्री राम ने अपने वनवास के समय यहाँ पर प्रवास किया था। यहाँ दो विशाल गुफाएं हैं उत्तर की ओर आई हुई गुफा को सीता वेंगा कहा जाता और दूसरी को जोगी मरहा के नाम से जाना जाता है। सीता वेंगा गुफा में भारत का प्राचीनतम थियेटर चलता है जहाँ 50 दर्शक बैठ सकते हैं। मुख्य द्वार पर एक अर्द्धगोलाकार पत्थर रखा गया है।
कवियों ने अपनी रचनाओं में इस स्थान का बखूबी उल्लेख किया है। सुतानुका नामक देवदासी और मूर्तिकार देवदत्ता की प्रेम कहानी पर भी प्रकाश डालता है। इसी कारण ऐसा माना जाता है कि यह भारत का प्राचीनतम थियेटर है।
कवियों ने अपनी रचनाओं में इस स्थान का बखूबी उल्लेख किया है। सुतानुका नामक देवदासी और मूर्तिकार देवदत्ता की प्रेम कहानी पर भी प्रकाश डालता है। इसी कारण ऐसा माना जाता है कि यह भारत का प्राचीनतम थियेटर है।
सेमरसोट अभ्यारण्य ( 20 किमी ) : 430.35 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैले इस अभ्यारण्य में पवाई नामक झरना बहता है। यहाँ देखे जाने वाले प्रमुख जानवरों में चीता, भालू और बारहसिंगा इत्यादि हैं।
तमोरपिंगला अभ्यारण्य ( 84 किमी ) : यहाँ पाए जाने वाले जानवरों में बाघ, भालू, चीता और बारहसिंगा आदि प्रमुख हैं।


